Bhagavadgitabhashya/Moola: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 5: | Line 5: | ||
== प्रथमोऽध्यायः == | == प्रथमोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">धृतराष्ट्र उवाच</div> | <div class="uvacha-block">धृतराष्ट्र उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । | |||
| verse_lines = धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।;मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । | |||
| verse_lines = दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।;आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् । | |||
| verse_lines = पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् ।;व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । | |||
| verse_lines = अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।;युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । | |||
| verse_lines = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।;पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । | |||
| verse_lines = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।;सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम । | |||
| verse_lines = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।;नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः । | |||
| verse_lines = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।;अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । | |||
| verse_lines = अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।;नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । | |||
| verse_lines = अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।;पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । | |||
| verse_lines = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।;भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । | |||
| verse_lines = तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।;सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । | |||
| verse_lines = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।;सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । | |||
| verse_lines = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।;माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः । | |||
| verse_lines = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।;पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । | |||
| verse_lines = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।;नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । | |||
| verse_lines = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।;धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । | |||
| verse_lines = द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।;सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । | |||
| verse_lines = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।;नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । | |||
| verse_lines = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।;प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ २०॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते । | |||
| verse_lines = हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते । | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् । | |||
| verse_lines = यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।;कैर्मया सह योद्धव्यम् अस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । | |||
| verse_lines = योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।;धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । | |||
| verse_lines = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।;सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् । | |||
| verse_lines = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।;उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् । | |||
| verse_lines = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् ।;आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । | |||
| verse_lines = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।;तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान्॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । | |||
| verse_lines = कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।;दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । | |||
| verse_lines = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।;वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते । | |||
| verse_lines = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।;न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । | |||
| verse_lines = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।;नच श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । | |||
| verse_lines = न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।;किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च । | |||
| verse_lines = येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।;त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । | |||
| verse_lines = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।;मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । | |||
| verse_lines = एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।;अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन । | |||
| verse_lines = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।;पापमेवाश्रयेद् अस्मान् हत्वैतान् आततायिनः॥३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् । | |||
| verse_lines = तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।;स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । | |||
| verse_lines = यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।;कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् । | |||
| verse_lines = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् ।;कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । | |||
| verse_lines = कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।;धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम् अधर्मोऽभिभवत्युत॥४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । | |||
| verse_lines = अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।;स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । | |||
| verse_lines = संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।;पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः । | |||
| verse_lines = दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।;उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । | |||
| verse_lines = उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।;नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । | |||
| verse_lines = अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।;यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः । | |||
| verse_lines = यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।;धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥४६ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C01 | |||
| verse_id = BGB_C01_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । | |||
| verse_lines = एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।;विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥४७ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | ||
== द्वितीयोऽध्यायः == | == द्वितीयोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् । | |||
| verse_lines = तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।;विषीदन्तमिदं वाक्यम् उवाच मधुसूदनः॥१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । | |||
| verse_lines = कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।;अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते । | |||
| verse_lines = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।;क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अजुर्न उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अजुर्न उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । | |||
| verse_lines = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।;इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके । | |||
| verse_lines = गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।;हत्वाऽर्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । | |||
| verse_lines = न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।;यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः । | |||
| verse_lines = कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।;यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् । | |||
| verse_lines = न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् ।;अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥८ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः । | |||
| verse_lines = एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।;न योत्स्य इति गोविन्दम् उक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत । | |||
| verse_lines = तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।;सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । | |||
| verse_lines = अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।;गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । | |||
| verse_lines = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।;न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । | |||
| verse_lines = देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।;तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । | |||
| verse_lines = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।;आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । | |||
| verse_lines = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।;समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः । | |||
| verse_lines = नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।;उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । | |||
| verse_lines = अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।;विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । | |||
| verse_lines = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।;अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युध्यस्व भारत॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् । | |||
| verse_lines = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।;उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । | |||
| verse_lines = न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।;अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥२०॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् । | |||
| verse_lines = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।;कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । | |||
| verse_lines = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।;तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । | |||
| verse_lines = नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।;नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च । | |||
| verse_lines = अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।;नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते । | |||
| verse_lines = अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते ।;तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् । | |||
| verse_lines = अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।;तथाऽपि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । | |||
| verse_lines = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।;तस्माद् अपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । | |||
| verse_lines = अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।;अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्- | |||
| verse_lines = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-;आश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।;आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति;श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । | |||
| verse_lines = देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।;तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि । | |||
| verse_lines = स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि ।;धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् । | |||
| verse_lines = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् ।;सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । | |||
| verse_lines = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।;ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापम् अवाप्स्यसि॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् । | |||
| verse_lines = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।;सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणाद् अतिरिच्यते॥३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः । | |||
| verse_lines = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।;येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः । | |||
| verse_lines = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।;निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् । | |||
| verse_lines = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।;तस्माद् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । | |||
| verse_lines = सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।;ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापम् अवाप्स्यसि॥३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु । | |||
| verse_lines = एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।;बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । | |||
| verse_lines = नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।;स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । | |||
| verse_lines = व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।;बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः । | |||
| verse_lines = यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।;वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् । | |||
| verse_lines = कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।;क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् । | |||
| verse_lines = भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।;व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन । | |||
| verse_lines = त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।;निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । | |||
| verse_lines = यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।;तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । | |||
| verse_lines = कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।;मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V48 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । | |||
| verse_lines = योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।;सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥४८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V49 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय । | |||
| verse_lines = दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय ।;बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥४९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V50 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । | |||
| verse_lines = बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।;तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V51 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः । | |||
| verse_lines = कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।;जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । | |||
| verse_lines = यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।;तदा गन्ताऽसि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V53 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥ | |||
| verse_lines = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥;समाधावचला बुद्धिस्तदा योगम् अवाप्स्यसि॥ ५३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V54 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । | |||
| verse_lines = स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।;स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥५४ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् । | |||
| verse_lines = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।;आत्मन्येवाऽत्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । | |||
| verse_lines = दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।;वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V57 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् । | |||
| verse_lines = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।;नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V58 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । | |||
| verse_lines = यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।;इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V59 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः । | |||
| verse_lines = विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।;रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V60 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । | |||
| verse_lines = यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।;इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V61 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः । | |||
| verse_lines = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।;वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V62 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । | |||
| verse_lines = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।;सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V63 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः । | |||
| verse_lines = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।;स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशाद् विन(प्रण)श्यति ॥६३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V64 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् । | |||
| verse_lines = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् ।;आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V65 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते । | |||
| verse_lines = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।;प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V66 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना । | |||
| verse_lines = नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।;न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V67 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । | |||
| verse_lines = इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।;तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V68 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः । | |||
| verse_lines = तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।;इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V69 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । | |||
| verse_lines = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।;यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V70 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् । | |||
| verse_lines = आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।;तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V71 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः । | |||
| verse_lines = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।;निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C02 | |||
| verse_id = BGB_C02_V72 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । | |||
| verse_lines = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।;स्थित्वाऽस्याम् अन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्बाणम् ऋच्छति॥७२ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span> | ||
== तृतीयोऽध्यायः == | == तृतीयोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । | |||
| verse_lines = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।;तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । | |||
| verse_lines = व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।;तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीभगवानुवाच | |||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । | |||
| verse_lines = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।;न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । | |||
| verse_lines = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।;कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । | |||
| verse_lines = कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।;इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारस्स उच्यते ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन । | |||
| verse_lines = यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन ।;कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः स विशिष्यते ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । | |||
| verse_lines = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।;शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः । | |||
| verse_lines = यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।;तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । | |||
| verse_lines = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।;अनेन प्रसविष्यध्वम् एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । | |||
| verse_lines = देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।;परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । | |||
| verse_lines = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।;तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः । | |||
| verse_lines = यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।;भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः । | |||
| verse_lines = अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः ।;यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । | |||
| verse_lines = कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।;तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । | |||
| verse_lines = एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।;अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः । | |||
| verse_lines = यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः ।;आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन । | |||
| verse_lines = नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।;न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । | |||
| verse_lines = तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।;असक्तो ह्याचरन् कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । | |||
| verse_lines = कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।;लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । | |||
| verse_lines = यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।;स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । | |||
| verse_lines = न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।;नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । | |||
| verse_lines = यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।;मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । | |||
| verse_lines = उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।;सङ्करस्य च कर्ता स्याम् उपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । | |||
| verse_lines = सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।;कुर्याद् विद्वान् तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । | |||
| verse_lines = न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।;जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । | |||
| verse_lines = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।;अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । | |||
| verse_lines = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।;गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । | |||
| verse_lines = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।;तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । | |||
| verse_lines = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।;निराशीर्निर्ममो भूत्वा युदध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । | |||
| verse_lines = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।;श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । | |||
| verse_lines = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।;सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । | |||
| verse_lines = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।;प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । | |||
| verse_lines = इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।;तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । | |||
| verse_lines = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।;स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । | |||
| verse_lines = अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।;अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । | |||
| verse_lines = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।;महाशनो महापाप्मा विध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च । | |||
| verse_lines = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।;यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । | |||
| verse_lines = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।;कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । | |||
| verse_lines = इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।;एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । | |||
| verse_lines = तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।;पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । | |||
| verse_lines = इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।;मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C03 | |||
| verse_id = BGB_C03_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । | |||
| verse_lines = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।;जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थोऽध्यायः"></span> | ||
== चतुर्थोऽध्यायः == | == चतुर्थोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । | |||
| verse_lines = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।;विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । | |||
| verse_lines = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।;स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । | |||
| verse_lines = स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।;भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । | |||
| verse_lines = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।;कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । | |||
| verse_lines = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।;तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । | |||
| verse_lines = अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।;प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । | |||
| verse_lines = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।;अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । | |||
| verse_lines = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।;धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । | |||
| verse_lines = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।;त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । | |||
| verse_lines = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।;बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । | |||
| verse_lines = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।;मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः । | |||
| verse_lines = काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।;क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । | |||
| verse_lines = चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।;तस्य कर्तारमपि मां विध्यकर्तारमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा । | |||
| verse_lines = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।;इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः । | |||
| verse_lines = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।;कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः । | |||
| verse_lines = किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।;तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । | |||
| verse_lines = कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।;अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः । | |||
| verse_lines = कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः ।;स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः । | |||
| verse_lines = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।;ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । | |||
| verse_lines = त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।;कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । | |||
| verse_lines = निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।;शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । | |||
| verse_lines = यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।;समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः । | |||
| verse_lines = गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।;यज्ञायाऽचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । | |||
| verse_lines = ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।;ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । | |||
| verse_lines = दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।;ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । | |||
| verse_lines = श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।;शब्दादीन् विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । | |||
| verse_lines = सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।;आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे । | |||
| verse_lines = द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ।;स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयश्शंसितव्रताः॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे । | |||
| verse_lines = अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।;प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । | |||
| verse_lines = अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।;सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । | |||
| verse_lines = यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।;नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । | |||
| verse_lines = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।;कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप । | |||
| verse_lines = श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप ।;सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया । | |||
| verse_lines = तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।;उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव । | |||
| verse_lines = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।;येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । | |||
| verse_lines = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।;सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । | |||
| verse_lines = यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन ।;ज्ञानाग्निस्सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । | |||
| verse_lines = न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।;तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनाऽत्मनि विन्दति॥३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः । | |||
| verse_lines = श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः ।;ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । | |||
| verse_lines = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।;नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् । | |||
| verse_lines = योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।;आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C04 | |||
| verse_id = BGB_C04_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः । | |||
| verse_lines = तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।;छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चमोऽध्यायः == | == पञ्चमोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । | |||
| verse_lines = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।;यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ । | |||
| verse_lines = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।;तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । | |||
| verse_lines = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।;निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । | |||
| verse_lines = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।;एकमप्यास्थितः सम्यग् उभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते । | |||
| verse_lines = यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते ।;एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । | |||
| verse_lines = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।;योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । | |||
| verse_lines = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।;सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । | |||
| verse_lines = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।;पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि । | |||
| verse_lines = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि ।;इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । | |||
| verse_lines = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।;लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । | |||
| verse_lines = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।;योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । | |||
| verse_lines = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।;अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी । | |||
| verse_lines = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।;नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । | |||
| verse_lines = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।;न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । | |||
| verse_lines = नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।;अज्ञानेनाऽवृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । | |||
| verse_lines = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।;तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः । | |||
| verse_lines = तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।;गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । | |||
| verse_lines = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।;शुनि चैव श्वपाके च पण्डितास्समदर्शिनः॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । | |||
| verse_lines = इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।;निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । | |||
| verse_lines = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।;स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । | |||
| verse_lines = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।;स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । | |||
| verse_lines = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।;आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । | |||
| verse_lines = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।;कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । | |||
| verse_lines = योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।;स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः । | |||
| verse_lines = लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।;छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । | |||
| verse_lines = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।;अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । | |||
| verse_lines = स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।;प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः । | |||
| verse_lines = यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः ।;विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C05 | |||
| verse_id = BGB_C05_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । | |||
| verse_lines = भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।;सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥२९ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | ||
== षष्ठोऽध्यायः == | == षष्ठोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । | |||
| verse_lines = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।;स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव । | |||
| verse_lines = यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।;न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । | |||
| verse_lines = आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।;योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । | |||
| verse_lines = यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।;सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् । | |||
| verse_lines = उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् ।;आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः । | |||
| verse_lines = बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः ।;अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेताऽत्मैव शत्रुवत्॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । | |||
| verse_lines = जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।;शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः । | |||
| verse_lines = ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः ।;युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकाञ्चनः॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । | |||
| verse_lines = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।;साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । | |||
| verse_lines = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।;एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । | |||
| verse_lines = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।;नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चै(चे)लाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । | |||
| verse_lines = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।;उपविश्याऽसने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । | |||
| verse_lines = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।;सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । | |||
| verse_lines = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।;मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः । | |||
| verse_lines = युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।;शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । | |||
| verse_lines = नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।;न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । | |||
| verse_lines = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।;युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । | |||
| verse_lines = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।;निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । | |||
| verse_lines = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।;योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । | |||
| verse_lines = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।;यत्र चैवाऽत्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । | |||
| verse_lines = सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।;वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । | |||
| verse_lines = यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।;यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणाऽपि विचाल्यते॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । | |||
| verse_lines = तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।;स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । | |||
| verse_lines = संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।;मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया । | |||
| verse_lines = शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।;आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । | |||
| verse_lines = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।;ततस्ततो नियम्यैतद् आत्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् । | |||
| verse_lines = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।;उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः । | |||
| verse_lines = एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।;सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि । | |||
| verse_lines = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि ।;ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । | |||
| verse_lines = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।;तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । | |||
| verse_lines = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।;सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । | |||
| verse_lines = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।;सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । | |||
| verse_lines = योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।;एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । | |||
| verse_lines = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।;तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । | |||
| verse_lines = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।;अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । | |||
| verse_lines = असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।;वश्याऽत्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । | |||
| verse_lines = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।;अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति । | |||
| verse_lines = कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।;अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । | |||
| verse_lines = एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।;त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । | |||
| verse_lines = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।;न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । | |||
| verse_lines = प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।;शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । | |||
| verse_lines = अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।;एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । | |||
| verse_lines = तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।;यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । | |||
| verse_lines = पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।;जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । | |||
| verse_lines = प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।;अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । | |||
| verse_lines = तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।;कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन॥४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C06 | |||
| verse_id = BGB_C06_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । | |||
| verse_lines = योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।;श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥४७ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | ||
== सप्तमोऽध्यायः == | == सप्तमोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः । | |||
| verse_lines = मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः ।;असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । | |||
| verse_lines = ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।;यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । | |||
| verse_lines = मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।;यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । | |||
| verse_lines = भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।;अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । | |||
| verse_lines = अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।;जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । | |||
| verse_lines = एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।;अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । | |||
| verse_lines = मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।;मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः । | |||
| verse_lines = रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ।;प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । | |||
| verse_lines = पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।;जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । | |||
| verse_lines = बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।;बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् । | |||
| verse_lines = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।;धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । | |||
| verse_lines = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।;मत्त एवेति तान् विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । | |||
| verse_lines = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।;मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । | |||
| verse_lines = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।;मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । | |||
| verse_lines = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।;माययाऽपहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । | |||
| verse_lines = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।;आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । | |||
| verse_lines = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।;प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । | |||
| verse_lines = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।;आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते । | |||
| verse_lines = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।;वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । | |||
| verse_lines = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।;तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति । | |||
| verse_lines = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ।;तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । | |||
| verse_lines = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।;लभते च ततः कामान् मयैव विहितान् हि तान्॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । | |||
| verse_lines = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।;देवान् देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । | |||
| verse_lines = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।;परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । | |||
| verse_lines = नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।;मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । | |||
| verse_lines = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।;भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । | |||
| verse_lines = इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।;सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । | |||
| verse_lines = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।;ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । | |||
| verse_lines = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।;ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C07 | |||
| verse_id = BGB_C07_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । | |||
| verse_lines = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।;प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | ||
== अष्टमोऽध्यायः == | == अष्टमोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम । | |||
| verse_lines = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।;अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन । | |||
| verse_lines = अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ।;प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥२ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । | |||
| verse_lines = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।;भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥ | |||
| verse_lines = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥;अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । | |||
| verse_lines = अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।;यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । | |||
| verse_lines = यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।;तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । | |||
| verse_lines = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।;मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना । | |||
| verse_lines = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।;परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः। | |||
| verse_lines = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः।;सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव । | |||
| verse_lines = प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।;भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः । | |||
| verse_lines = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।;यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च । | |||
| verse_lines = सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।;मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणम् आस्थितो योगधारणाम्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् । | |||
| verse_lines = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।;यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । | |||
| verse_lines = अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।;तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् । | |||
| verse_lines = मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।;नाऽप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । | |||
| verse_lines = आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।;मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । | |||
| verse_lines = सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।;रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । | |||
| verse_lines = अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।;रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । | |||
| verse_lines = भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।;रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः । | |||
| verse_lines = परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः ।;यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः तमाहुः परमां गतिम् । | |||
| verse_lines = अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः तमाहुः परमां गतिम् ।;यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । | |||
| verse_lines = पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।;यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः । | |||
| verse_lines = यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।;प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । | |||
| verse_lines = अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।;तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । | |||
| verse_lines = धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।;तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । | |||
| verse_lines = शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।;एकया यात्यनावृत्तिम् अन्ययाऽऽवर्तते पुनः॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन । | |||
| verse_lines = नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।;तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C08 | |||
| verse_id = BGB_C08_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । | |||
| verse_lines = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।;अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ।;॥२८ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमोऽध्यायः"></span> | ||
== नवमोऽध्यायः == | == नवमोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । | |||
| verse_lines = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।;ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । | |||
| verse_lines = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।;प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप । | |||
| verse_lines = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।;अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । | |||
| verse_lines = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।;मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । | |||
| verse_lines = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।;भूतभृन्न च भूतस्थो ममाऽत्मा भूतभावनः॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् । | |||
| verse_lines = यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।;तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । | |||
| verse_lines = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।;कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । | |||
| verse_lines = प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।;भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय । | |||
| verse_lines = न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।;उदासीनवदासीनम् असक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । | |||
| verse_lines = मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।;हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | |||
| verse_lines = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।;परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । | |||
| verse_lines = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।;राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः । | |||
| verse_lines = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।;भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः । | |||
| verse_lines = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।;नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । | |||
| verse_lines = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।;एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतो मुखम्॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् । | |||
| verse_lines = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।;मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । | |||
| verse_lines = पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।;वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । | |||
| verse_lines = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।;प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । | |||
| verse_lines = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।;अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः | |||
| verse_lines = त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः;यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।;ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं;अश्नन्तिदिव्यान् दिवि देवभोगान् ॥२०॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं | |||
| verse_lines = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं;क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।;एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना;गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । | |||
| verse_lines = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।;तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः । | |||
| verse_lines = येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।;तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । | |||
| verse_lines = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।;न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः । | |||
| verse_lines = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।;भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । | |||
| verse_lines = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।;तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । | |||
| verse_lines = यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।;यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । | |||
| verse_lines = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।;संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । | |||
| verse_lines = समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।;ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् । | |||
| verse_lines = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।;साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । | |||
| verse_lines = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।;कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । | |||
| verse_lines = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।;स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा । | |||
| verse_lines = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।;अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C09 | |||
| verse_id = BGB_C09_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | |||
| verse_lines = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि युक्त्वैवम् आत्मानं मत्परायणः॥३४ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | ||
== दशमोऽध्यायः == | == दशमोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः । | |||
| verse_lines = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।;यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । | |||
| verse_lines = न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।;अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । | |||
| verse_lines = यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।;असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । | |||
| verse_lines = बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।;सुखं दुःखं भवो भावो भयं चाभयमेव च॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । | |||
| verse_lines = अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।;भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा । | |||
| verse_lines = महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।;मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । | |||
| verse_lines = एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।;सोविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । | |||
| verse_lines = अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।;इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् । | |||
| verse_lines = मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।;कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । | |||
| verse_lines = तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।;ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । | |||
| verse_lines = तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।;नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥११ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । | |||
| verse_lines = परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।;पुरुषं शाश्वतं दिव्यम् आदिदेवमजं विभुम्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । | |||
| verse_lines = आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।;असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । | |||
| verse_lines = सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।;न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । | |||
| verse_lines = स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।;भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । | |||
| verse_lines = वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।;याभिर्विभूतिभिर्लोकान् इमान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् । | |||
| verse_lines = कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् ।;केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन् मया॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । | |||
| verse_lines = विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।;भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥१८ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । | |||
| verse_lines = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।;प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । | |||
| verse_lines = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।;अहमादिश्च मध्यश्च च भूतानामन्त एव च॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । | |||
| verse_lines = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।;मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । | |||
| verse_lines = वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।;इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । | |||
| verse_lines = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।;वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । | |||
| verse_lines = पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।;सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । | |||
| verse_lines = महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।;यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । | |||
| verse_lines = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।;गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । | |||
| verse_lines = उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।;ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । | |||
| verse_lines = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।;प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । | |||
| verse_lines = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।;पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । | |||
| verse_lines = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।;मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । | |||
| verse_lines = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।;झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । | |||
| verse_lines = सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।;अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । | |||
| verse_lines = अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।;अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् । | |||
| verse_lines = मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् ।;कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । | |||
| verse_lines = बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।;मासानां मार्गशीर्षोऽहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । | |||
| verse_lines = द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।;जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । | |||
| verse_lines = वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।;मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । | |||
| verse_lines = दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।;मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । | |||
| verse_lines = यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।;न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । | |||
| verse_lines = नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।;एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । | |||
| verse_lines = यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।;तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C10 | |||
| verse_id = BGB_C10_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । | |||
| verse_lines = अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।;विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | ||
== एकादशोऽध्यायः == | == एकादशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । | |||
| verse_lines = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।;यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । | |||
| verse_lines = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।;त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । | |||
| verse_lines = एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।;द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो । | |||
| verse_lines = मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो ।;योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम्॥४ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः । | |||
| verse_lines = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।;नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । | |||
| verse_lines = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।;बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । | |||
| verse_lines = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।;मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । | |||
| verse_lines = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।;दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः । | |||
| verse_lines = एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।;दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् । | |||
| verse_lines = अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् ।;अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । | |||
| verse_lines = दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।;सर्वाश्चर्यमयं देवम् अनन्तं विश्वतो मुखम्॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । | |||
| verse_lines = दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।;यदि भाः सदृशी सा स्यात् भासस्तस्य महात्मनः॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । | |||
| verse_lines = तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।;अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । | |||
| verse_lines = ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।;प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥१४ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् । | |||
| verse_lines = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।;ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । | |||
| verse_lines = अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।;नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । | |||
| verse_lines = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।;पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । | |||
| verse_lines = त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।;त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्तासनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । | |||
| verse_lines = अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।;पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । | |||
| verse_lines = द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।;दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । | |||
| verse_lines = अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।;स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । | |||
| verse_lines = रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।;गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । | |||
| verse_lines = रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।;बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाऽहम्॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । | |||
| verse_lines = नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।;दृष्ट्वा हि त्वा(त्वां) प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । | |||
| verse_lines = दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।;दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः । | |||
| verse_lines = अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।;भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । | |||
| verse_lines = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।;केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । | |||
| verse_lines = यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।;तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । | |||
| verse_lines = यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।;तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः । | |||
| verse_lines = लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः ।;तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । | |||
| verse_lines = आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।;विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । | |||
| verse_lines = कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।;ऋतेऽपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । | |||
| verse_lines = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।;मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् । | |||
| verse_lines = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।;मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेताऽसि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । | |||
| verse_lines = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।;नमस्कृत्वा भूय एवाऽह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । | |||
| verse_lines = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।;रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । | |||
| verse_lines = कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।;अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । | |||
| verse_lines = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।;वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । | |||
| verse_lines = वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।;नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । | |||
| verse_lines = नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।;अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । | |||
| verse_lines = सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।;अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । | |||
| verse_lines = यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।;एकोऽथवाऽप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । | |||
| verse_lines = पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।;न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । | |||
| verse_lines = तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।;पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । | |||
| verse_lines = अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।;तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । | |||
| verse_lines = किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।;तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । | |||
| verse_lines = मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।;तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V48 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । | |||
| verse_lines = न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।;एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V49 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् । | |||
| verse_lines = मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् ।;व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V50 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । | |||
| verse_lines = इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।;आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V51 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । | |||
| verse_lines = दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।;इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । | |||
| verse_lines = सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।;देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V53 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । | |||
| verse_lines = नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।;शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V54 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । | |||
| verse_lines = भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।;ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C11 | |||
| verse_id = BGB_C11_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । | |||
| verse_lines = मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।;निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशोऽध्यायः"></span> | ||
== द्वादशोऽध्यायः == | == द्वादशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । | |||
| verse_lines = एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।;ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते । | |||
| verse_lines = मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।;श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते । | |||
| verse_lines = ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते ।;सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । | |||
| verse_lines = सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।;ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् । | |||
| verse_lines = क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।;अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । | |||
| verse_lines = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।;अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । | |||
| verse_lines = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।;भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । | |||
| verse_lines = मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।;निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । | |||
| verse_lines = अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।;अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाऽप्तुं धनञ्जय॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । | |||
| verse_lines = अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।;मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । | |||
| verse_lines = अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।;सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते । | |||
| verse_lines = श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते ।;ध्यानात्कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । | |||
| verse_lines = अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।;निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । | |||
| verse_lines = सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।;मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । | |||
| verse_lines = यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।;हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । | |||
| verse_lines = अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।;सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । | |||
| verse_lines = यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।;शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यस्स मे प्रियः॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । | |||
| verse_lines = समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।;शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । | |||
| verse_lines = तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।;अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C12 | |||
| verse_id = BGB_C12_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । | |||
| verse_lines = ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।;श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥२० ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशोऽध्यायः"></span> | ||
== त्रयोदशोऽध्यायः == | == त्रयोदशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । | |||
| verse_lines = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।;एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । | |||
| verse_lines = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।;एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । | |||
| verse_lines = क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।;क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् । | |||
| verse_lines = तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।;स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । | |||
| verse_lines = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।;ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । | |||
| verse_lines = महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।;इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः । | |||
| verse_lines = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।;एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । | |||
| verse_lines = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।;आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च । | |||
| verse_lines = इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च ।;जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । | |||
| verse_lines = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।;नित्यं च समचित्तत्वम् इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । | |||
| verse_lines = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।;विविक्तदेशसेवित्वम् अरतिर्जनसंसदि॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । | |||
| verse_lines = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।;एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् अज्ञानं यदतोऽन्यथा॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते । | |||
| verse_lines = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।;अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । | |||
| verse_lines = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।;सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं । | |||
| verse_lines = सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं ।;असक्तं सर्वभृच्चैव(भुक्चैव) निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च । | |||
| verse_lines = बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च ।;सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । | |||
| verse_lines = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।;भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । | |||
| verse_lines = ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।;ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः । | |||
| verse_lines = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।;मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । | |||
| verse_lines = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।;विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । | |||
| verse_lines = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।;पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् । | |||
| verse_lines = पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।;कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः । | |||
| verse_lines = उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।;परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । | |||
| verse_lines = य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।;सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽपि जायते॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । | |||
| verse_lines = ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।;अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते । | |||
| verse_lines = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।;तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । | |||
| verse_lines = यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।;क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात् तद्विद्धि भरतर्षभ॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । | |||
| verse_lines = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।;विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । | |||
| verse_lines = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।;न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । | |||
| verse_lines = प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।;यः पश्यति तथाऽऽत्मानम् अकर्तारं स पश्यति॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति । | |||
| verse_lines = यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति ।;तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः । | |||
| verse_lines = अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः ।;शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते । | |||
| verse_lines = यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते ।;सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । | |||
| verse_lines = यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।;क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C13 | |||
| verse_id = BGB_C13_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा । | |||
| verse_lines = क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।;भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥३५ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशोऽध्यायः"></span> | ||
== चतुर्दशोऽध्यायः == | == चतुर्दशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । | |||
| verse_lines = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।;यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । | |||
| verse_lines = इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।;सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् । | |||
| verse_lines = मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।;सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । | |||
| verse_lines = सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।;तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । | |||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।;निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् । | |||
| verse_lines = तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।;सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । | |||
| verse_lines = रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।;तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । | |||
| verse_lines = तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।;प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत । | |||
| verse_lines = सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।;ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । | |||
| verse_lines = रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।;रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते । | |||
| verse_lines = सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।;ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । | |||
| verse_lines = लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।;रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । | |||
| verse_lines = अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।;तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । | |||
| verse_lines = यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।;तदोत्तमविदां लोकान् अमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । | |||
| verse_lines = रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।;तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । | |||
| verse_lines = कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।;रजसस्तु फलं दुःखम् अज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । | |||
| verse_lines = सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।;प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । | |||
| verse_lines = ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।;जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति । | |||
| verse_lines = नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।;गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् । | |||
| verse_lines = गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।;जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥२० ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो । | |||
| verse_lines = कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो ।;किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणान् अतिवर्तते॥२१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । | |||
| verse_lines = प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।;न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । | |||
| verse_lines = उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।;गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । | |||
| verse_lines = समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।;तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । | |||
| verse_lines = मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।;सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । | |||
| verse_lines = मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।;स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C14 | |||
| verse_id = BGB_C14_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च । | |||
| verse_lines = ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च ।;शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चदशोऽध्यायः == | == पञ्चदशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । | |||
| verse_lines = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।;छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । | |||
| verse_lines = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।;अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । | |||
| verse_lines = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।;अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम् असङ्गशस्त्रेण दृढेन च्छित्त्वा॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः । | |||
| verse_lines = ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।;तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः । | |||
| verse_lines = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।;द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैः गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । | |||
| verse_lines = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।;यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । | |||
| verse_lines = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।;मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । | |||
| verse_lines = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।;गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । | |||
| verse_lines = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।;अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । | |||
| verse_lines = उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।;विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । | |||
| verse_lines = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।;यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् । | |||
| verse_lines = यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् ।;यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । | |||
| verse_lines = गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।;पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । | |||
| verse_lines = अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।;प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । | |||
| verse_lines = सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।;वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । | |||
| verse_lines = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।;क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । | |||
| verse_lines = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।;यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । | |||
| verse_lines = यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।;अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । | |||
| verse_lines = यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।;स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C15 | |||
| verse_id = BGB_C15_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ । | |||
| verse_lines = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।;एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशोऽध्यायः"></span> | ||
== षोडशोऽध्यायः == | == षोडशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। | |||
| verse_lines = अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।;दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । | |||
| verse_lines = अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।;दया भूतेष्वलोलुत्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता । | |||
| verse_lines = तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता ।;भवन्ति सम्पदं दैवीम् अभि जातस्य भारत॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । | |||
| verse_lines = दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।;अज्ञानं चाभि जातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । | |||
| verse_lines = दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।;मा शुचः सम्पदं दैवीम् अभि जातोऽसि पाण्डव॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च । | |||
| verse_lines = द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।;दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । | |||
| verse_lines = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।;न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | |||
| verse_lines = असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।;अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः । | |||
| verse_lines = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।;प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः । | |||
| verse_lines = काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।;मोहाद् गृहीत्वाऽसद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । | |||
| verse_lines = चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।;कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः । | |||
| verse_lines = आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।;ईहन्ते कामभोगार्थम् अन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् । | |||
| verse_lines = इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।;इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । | |||
| verse_lines = असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।;ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । | |||
| verse_lines = आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।;यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः । | |||
| verse_lines = अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।;प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । | |||
| verse_lines = आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।;यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । | |||
| verse_lines = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।;मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् । | |||
| verse_lines = तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।;क्षिपाम्यजस्रमशुभान् आसुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनिजन्मनि । | |||
| verse_lines = आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनिजन्मनि ।;मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । | |||
| verse_lines = त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।;कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । | |||
| verse_lines = एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।;आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । | |||
| verse_lines = यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।;न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C16 | |||
| verse_id = BGB_C16_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । | |||
| verse_lines = तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।;ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | ||
== सप्तदशोऽध्यायः == | == सप्तदशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः । | |||
| verse_lines = ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।;तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा । | |||
| verse_lines = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।;सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । | |||
| verse_lines = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।;श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः । | |||
| verse_lines = यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।;प्रेतान् भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः । | |||
| verse_lines = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।;दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः । | |||
| verse_lines = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।;मां चैवान्तःशरीरस्थं तान् विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । | |||
| verse_lines = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।;यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । | |||
| verse_lines = आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।;रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । | |||
| verse_lines = कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।;आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् । | |||
| verse_lines = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।;उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । | |||
| verse_lines = अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।;यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । | |||
| verse_lines = अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।;इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् । | |||
| verse_lines = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।;श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । | |||
| verse_lines = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।;ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । | |||
| verse_lines = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।;स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । | |||
| verse_lines = मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।;भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः । | |||
| verse_lines = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।;अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । | |||
| verse_lines = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।;क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । | |||
| verse_lines = मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।;परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । | |||
| verse_lines = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।;देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । | |||
| verse_lines = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।;दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते । | |||
| verse_lines = अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते ।;असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः । | |||
| verse_lines = ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।;ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । | |||
| verse_lines = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।;प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः । | |||
| verse_lines = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।;दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते । | |||
| verse_lines = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ।;प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते । | |||
| verse_lines = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।;कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C17 | |||
| verse_id = BGB_C17_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् । | |||
| verse_lines = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।;असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशोऽध्यायः"></span> | ||
== अष्टादशोऽध्यायः == | == अष्टादशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । | |||
| verse_lines = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।;त्यागस्य च हृषीकेश पृथक् केशिनिषूदन॥१ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्रीभगवानुवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः । | |||
| verse_lines = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।;सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । | |||
| verse_lines = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।;यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । | |||
| verse_lines = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।;त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । | |||
| verse_lines = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।;यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । | |||
| verse_lines = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।;कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । | |||
| verse_lines = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।;मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । | |||
| verse_lines = दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।;स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन । | |||
| verse_lines = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।;सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते । | |||
| verse_lines = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते ।;त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । | |||
| verse_lines = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।;यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । | |||
| verse_lines = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।;भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे । | |||
| verse_lines = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।;साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् । | |||
| verse_lines = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।;विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः । | |||
| verse_lines = शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।;न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः । | |||
| verse_lines = तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः ।;पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । | |||
| verse_lines = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।;हत्वाऽपि स इमान् लोकान् न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना । | |||
| verse_lines = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।;करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । | |||
| verse_lines = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।;प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । | |||
| verse_lines = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।;अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् । | |||
| verse_lines = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।;वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् । | |||
| verse_lines = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।;अतत्त्वार्थवदल्पं च तत् तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् । | |||
| verse_lines = नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् ।;अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत् सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । | |||
| verse_lines = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।;क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् । | |||
| verse_lines = अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् ।;मोहादारभ्यते कर्म यत्तत् तामसमुच्यते॥२५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । | |||
| verse_lines = मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।;सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः । | |||
| verse_lines = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।;हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः । | |||
| verse_lines = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।;विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु । | |||
| verse_lines = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।;प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये । | |||
| verse_lines = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।;बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च । | |||
| verse_lines = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।;अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता । | |||
| verse_lines = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।;सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः । | |||
| verse_lines = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।;योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन । | |||
| verse_lines = यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।;प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च । | |||
| verse_lines = यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।;न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ । | |||
| verse_lines = सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।;अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् । | |||
| verse_lines = यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।;तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम् आत्मबुद्धिप्रसादजम्॥३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् । | |||
| verse_lines = विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् ।;परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः । | |||
| verse_lines = यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।;निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । | |||
| verse_lines = न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।;सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप । | |||
| verse_lines = ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।;कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । | |||
| verse_lines = शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।;ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं (ब्रह्मकर्म)ब्राह्मं कर्म स्वभावजम्॥४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । | |||
| verse_lines = शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।;दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । | |||
| verse_lines = कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।;परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः । | |||
| verse_lines = स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।;स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । | |||
| verse_lines = यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।;स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । | |||
| verse_lines = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।;स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् नाऽप्नोति किल्बिषम्॥४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V48 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । | |||
| verse_lines = सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।;सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवाऽवृताः॥४८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V49 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । | |||
| verse_lines = असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।;नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥४९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V50 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे । | |||
| verse_lines = सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ।;समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V51 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च । | |||
| verse_lines = बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।;शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । | |||
| verse_lines = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।;ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V53 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । | |||
| verse_lines = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।;विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V54 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । | |||
| verse_lines = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।;समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः । | |||
| verse_lines = भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।;ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः । | |||
| verse_lines = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।;मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V57 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः । | |||
| verse_lines = चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।;बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V58 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । | |||
| verse_lines = मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।;अथ चेत् त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V59 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे । | |||
| verse_lines = यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।;मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V60 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । | |||
| verse_lines = स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।;कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥६० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V61 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । | |||
| verse_lines = ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।;भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V62 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । | |||
| verse_lines = तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।;तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V63 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया । | |||
| verse_lines = इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।;विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V64 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः । | |||
| verse_lines = सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।;इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V65 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | |||
| verse_lines = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V66 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । | |||
| verse_lines = सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।;अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V67 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । | |||
| verse_lines = इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।;न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V68 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति । | |||
| verse_lines = य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।;भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V69 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः । | |||
| verse_lines = न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।;भविता न च मे तस्माद् अन्यः प्रियतरो भुवि॥६९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V70 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः । | |||
| verse_lines = अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।;ज्ञानयज्ञेन तेनाहम् इष्टः स्यामिति मे मतिः॥७० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V71 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः । | |||
| verse_lines = श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।;सोऽपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥७१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V72 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा । | |||
| verse_lines = कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।;कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V73 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत । | |||
| verse_lines = नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।;स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥ | |||
}} | |||
<div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | <div class="uvacha-block">सञ्जय उवाच</div> | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V74 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः । | |||
| verse_lines = इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।;संवादमिममश्रौषम् अद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V75 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् । | |||
| verse_lines = व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् ।;योगं योगेश्वरात् कृष्णात् साक्षात् कथयतः स्वयम्॥७५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V76 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् । | |||
| verse_lines = राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।;केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V77 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः । | |||
| verse_lines = तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।;विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BGB | |||
| chapter_id = BGB_C18 | |||
| verse_id = BGB_C18_V78 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । | |||
| verse_lines = यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।;तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavadgitabhashya]] | [[Category:Bhagavadgitabhashya]] | ||
[[Category:Moola]] | [[Category:Moola]] | ||
Latest revision as of 07:03, 8 June 2026
श्रीमद्भगवद्गीताप्रस्थानम् — मूलम्
प्रथमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणाम् आचार्य महतीं चमूम् ।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
तस्य संजनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
अर्जुन उवाच
हृषीकेशं तदा वाक्यम् इदमाह महीपते ।
यावदेतान् निरीक्षेऽहं योद्धुकामान् अवस्थितान् ।
सञ्जय उवाच
योत्स्यमानान् अवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄन् अथ पितामहान् ।
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
एतान् न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापाद् अस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यदि मामप्रतीकारम् अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वाऽर्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
द्वितीयोऽध्यायः
सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाऽऽविष्टम् अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
श्री भगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत् त्वय्युपपद्यते ।
अजुर्न उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकम् उच्छोषणम् इन्द्रियाणाम् ।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
अविनाशि तु तद् विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
अच्छेद्योऽयम् अदाह्योऽयम् अक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् अविकार्योऽयमुच्यते ।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्-
देही नित्यम् अवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि ।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् ।
अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयाऽपहृतचेतसाम् ।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद् धनञ्जय ।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ॥
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान् इन्द्रियैश्चरन् ।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तस्माद् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
आपूर्यमाणम् अचलप्रतिष्ठं समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।
विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
तृतीयोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
श्रीभगवानुवाच
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्याऽरभतेऽर्जुन ।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः ।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
यस्त्वात्मरतिरेव स्याद् आत्मतृप्तश्च मानवः ।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
न बुद्धिभेदं जनयेद् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
चतुर्थोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
कर्मण्यकर्म यः पश्येद् अकर्मणि च कर्म यः ।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
त्यक्त्वा कर्मफलाऽसङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ।
अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।
अपरे नियताऽहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञाद् ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
श्रद्धावाल्लँभते ज्ञानं मत्परः संयतेन्द्रियः ।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
तस्माद् अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।
पञ्चमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
श्री भगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद् योगैरपि गम्यते ।
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन्नपि ।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याऽस्ते सुखं वशी ।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
नाऽदत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तद्बुद्धयस्तदात्मानः तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
इहैव तैर्जितस्सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
लभन्ते ब्रह्मनिर्बा(वा)णम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिर्मोक्षपरायणः ।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
षष्ठोऽध्यायः
श्री भगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नाऽत्मानमवसादयेत् ।
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनाऽत्मैवाऽत्मना जितः ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेन्द्रियः ।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः ।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
संङ्कल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
एवं युञ्जन् सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चाऽत्मनि ।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
असंयताऽत्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
सप्तमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन् मदाश्रयः ।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभाऽस्मि शशिसूर्ययोः ।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयाऽर्चितुमिच्छति ।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
अष्टमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन् मधुसूदन ।
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।
यं यं वाऽपि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः।
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
सहस्रयुगपर्यन्तम् अहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तो व्यक्तात्सनातनः ।
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः तमाहुः परमां गतिम् ।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।
वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
नवमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
न च(तु) मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ।
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
त्रैविद्या मां सोमपा पूतपापाः
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
दशमोऽध्यायः
भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
आहुस्त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
स्वयमेवाऽत्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
कथं विद्यामहं योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
मृत्युः सर्वहरश्चाहम् उद्भवश्च भविष्यताम् ।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
एकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
मन्यसे यदि तच्छक्यं भयाद् द्रष्टुमिति प्रभो ।
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।
अनेकवक्त्रनयनम् अनेकाद्भुतदर्शनम् ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यम् अनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताद् लोकान् समग्रान् वदनैर्ज्वलद्भिः ।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
श्रीभगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथाऽन्यानपि योधवीरान् ।
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत् प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
यच्चापहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैः न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ् ममेदम् ।
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यम् अव्यक्तं पर्युपासते ।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम् अव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाध्यानं विशिष्यते ।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
त्रयोदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
तत् क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् ।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम् अनहङ्कार एव च ।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितं ।
बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च ।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
य (एनं)एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।
यावत्सञ्जायते किञ्चित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यदा भूतपृथग्भावम् एकस्थमनुपश्यति ।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्माऽयमव्ययः ।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्याद् आकाशं नोपलिप्यते ।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवम् अन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टाऽनुपश्यति ।
गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतान् अतीतो भवति प्रभो ।
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहम् अमृतस्याव्ययस्य च ।
पञ्चदशोऽध्यायः
श्री भगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
ततः परं(पदं) तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेऽखिलम् ।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।
षोडशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहो नातिमानिता ।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
दैवी सम्पद् विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
इदमद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनिजन्मनि ।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
सप्तदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
आयुस्सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
कट्वाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
मूढग्राहेणाऽत्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
अदेशकाले यद्दानम् अपात्रेभ्यश्च दीयते ।
ओम् तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
अष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
दुःखमित्येव यत् कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्य(ज्ज)ते ।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
शरीरवाङ् मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।
तत्रैवं सति कर्तारम् आत्मानं केवलं तु यः ।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
नियतं सङ्गरहितम् अरागद्वेषतः कृतम् ।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता ।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रेमृतोपमम् ।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ।
बुध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
य इमं(इदं) परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ।
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान् एतद्गुह्यमहं परम् ।
राजन् संस्मृत्यसंस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
तच्च संस्मृत्यसंस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।