Katha/Data: Difference between revisions
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| verse_text = | | verse_text = सोऽमन्यत¦पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।¦अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = सोऽमन्यत¦पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।¦अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | | verse_lines = सोऽमन्यत¦पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।¦अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | ||
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| verse_text = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् | | verse_text = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् ।¦तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | ||
| verse_lines = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् ।¦तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | | verse_lines = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् ।¦तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_text = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः | | verse_text = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।¦किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | ||
| verse_lines = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।¦किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | | verse_lines = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।¦किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_text = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे | | verse_text = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।¦सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | ||
| verse_lines = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।¦सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | | verse_lines = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।¦सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_text = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् | | verse_text = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।¦तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।¦तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | | verse_lines = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।¦तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_text = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् | | verse_text = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् ।¦एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् ।¦एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | | verse_lines = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् ।¦एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_text = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः | | verse_text = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।¦नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | ||
| verse_lines = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।¦नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | | verse_lines = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।¦नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_text = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो | | verse_text = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।¦त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १॥ ९ ॥ | ||
| verse_lines = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।¦त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १॥ ९ ॥ | | verse_lines = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।¦त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १॥ ९ ॥ | ||
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| verse_text = यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः | | verse_text = यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।¦सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ २॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।¦सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ २॥ १० ॥ | | verse_lines = यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।¦सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ २॥ १० ॥ | ||
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| verse_text = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति | | verse_text = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।¦उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ३॥ ११ ॥ | ||
| verse_lines = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।¦उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ३॥ ११ ॥ | | verse_lines = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।¦उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ३॥ ११ ॥ | ||
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| verse_text = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्र ब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् | | verse_text = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्र ब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ।¦स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ ४॥ १२ ॥ | ||
| verse_lines = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्र ब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ।¦स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ ४॥ १२ ॥ | | verse_lines = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्र ब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ।¦स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ ४॥ १२ ॥ | ||
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| verse_text = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् | | verse_text = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।¦अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ ५॥ १३ ॥ | ||
| verse_lines = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।¦अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ ५॥ १३ ॥ | | verse_lines = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।¦अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ ५॥ १३ ॥ | ||
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| verse_text = लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।¦स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।¦स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः ।¦तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः (शृ)सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः ।¦तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः (शृ)सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।¦ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥ | |||
| verse_lines = त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।¦ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।¦स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_text = एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।¦एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥ | |||
| verse_lines = एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।¦एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_text = येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।¦एतद् विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।¦एतद् विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_text = नमो भगवते तस्मै सर्वतः परमाय ते ।¦सर्वप्राणिहृदिस्थाय वामनाय नमो नमः ॥ | |||
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| verse_text = अग्नौ विष्णुं सदा ध्यायंस्त्रिशोऽग्निं नाचिकेतकम् ।¦यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥¦उष्य मन्वन्तरं कालम् अमृतत्वं भजेत् क्रमात्॥’ इति ब्रह्मसारे ॥¦इच्छन् वाजश्रवोनप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् ।¦उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥¦मां दत्त्वाऽपि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति ।¦उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥ | |||
| verse_lines = अग्नौ विष्णुं सदा ध्यायंस्त्रिशोऽग्निं नाचिकेतकम् ।¦यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥¦उष्य मन्वन्तरं कालम् अमृतत्वं भजेत् क्रमात्॥’ इति ब्रह्मसारे ॥¦इच्छन् वाजश्रवोनप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् ।¦उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥¦मां दत्त्वाऽपि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति ।¦उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥ | |||
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| verse_text = स जगाम यमं बालो ब्रह्मचारी यमस्य तु ।¦पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥¦आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥ | |||
| verse_lines = स जगाम यमं बालो ब्रह्मचारी यमस्य तु ।¦पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥¦आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥ | |||
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| verse_text = इत्युक्तस्स यमस्तं तु सम्पूज्यादाद् वरत्रयम् ॥ ७-८ ॥ | |||
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| verse_text = सौमनस्यं पितुश्चैव नाचिकेताग्निगं हरिम् ।¦(मुक्ते) मृते स्थितञ्च तं विष्णुम् इति प्रादात् वरत्रयम् ॥ इति गतिसारे ॥¦अग्र्यत्वादग्निनामाऽसौ नाचिकेताग्निगो हरिः ।¦लोको विष्णोरनन्तस्य तज्ज्ञानान्नित्य आप्यते ॥¦‘प्रतिष्ठा सर्वलोकस्य स विष्णुस्सर्वहृद्गतः ।¦स एव सर्वलोकादिस्तं ज्ञात्वा मुच्यते ध्रुवम् ॥’ इति च ॥ | |||
| verse_lines = सौमनस्यं पितुश्चैव नाचिकेताग्निगं हरिम् ।¦(मुक्ते) मृते स्थितञ्च तं विष्णुम् इति प्रादात् वरत्रयम् ॥ इति गतिसारे ॥¦अग्र्यत्वादग्निनामाऽसौ नाचिकेताग्निगो हरिः ।¦लोको विष्णोरनन्तस्य तज्ज्ञानान्नित्य आप्यते ॥¦‘प्रतिष्ठा सर्वलोकस्य स विष्णुस्सर्वहृद्गतः ।¦स एव सर्वलोकादिस्तं ज्ञात्वा मुच्यते ध्रुवम् ॥’ इति च ॥ | |||
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| verse_lines = <span class="gr-moola">या इष्टका</span> या इष्टकादेवताः ।¦इष्टकादेवतां विष्णुं षष्ट्युत्तरशतत्रिकम् ।¦यथावदेव विज्ञाय मुच्यते कर्मबन्धनात् ॥ इति च (इति .हृ)॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">लोकादिः</span>, <span class="gr-moola">प्रतिष्ठा</span>, <span class="gr-moola">ब्रह्मजज्ञोऽनन्तलोकाप्तिः</span>इत्यादिविशेषणैश्च भगवानेव। ‘स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठाम्’(कौ.आ.ब्रा.५.११) इति परामर्शाच्च । भगवतो ह्युरुगायनाम प्रसिद्धम् । गुहानिहितत्वं च तस्यैव विशेषतः प्रसिद्धम् ॥¦न चाग्निपरिज्ञानमात्रेणानन्तलोकाप्तिः, भगवज्ज्ञानं विना । ‘तद् वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति’ इत्यादिश्रुतेः । न च मुख्ये सम्भवति(मुख्यार्थे सति. व्यासतीर्थीय) अमुख्यार्थो युज्यते । | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">लोकादिः</span>, <span class="gr-moola">प्रतिष्ठा</span>, <span class="gr-moola">ब्रह्मजज्ञोऽनन्तलोकाप्तिः</span>इत्यादिविशेषणैश्च भगवानेव। ‘स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठाम्’(कौ.आ.ब्रा.५.११) इति परामर्शाच्च । भगवतो ह्युरुगायनाम प्रसिद्धम् । गुहानिहितत्वं च तस्यैव विशेषतः प्रसिद्धम् ॥¦न चाग्निपरिज्ञानमात्रेणानन्तलोकाप्तिः, भगवज्ज्ञानं विना । ‘तद् वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद् भवति’ इत्यादिश्रुतेः । न च मुख्ये सम्भवति(मुख्यार्थे सति. व्यासतीर्थीय) अमुख्यार्थो युज्यते । | |||
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| chapter_id = KKN_C01 | |||
| verse_id = KKN_C01_S01_V19_B01 | |||
| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = प्रेते¦मुक्ते मनुष्ये नियामकत्वेन भगवानस्तीति ज्ञानिनो वदन्ति, नास्तीत्यज्ञाः । तस्य नियामकस्य स्वरूपं यथावदहं विद्याम् । | |||
| verse_lines = प्रेते¦मुक्ते मनुष्ये नियामकत्वेन भगवानस्तीति ज्ञानिनो वदन्ति, नास्तीत्यज्ञाः । तस्य नियामकस्य स्वरूपं यथावदहं विद्याम् । | |||
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| verse_id = KKN_C01_S01 | |||
| verse_type = paada | |||
| verse_text = प्रथमावल्ली | |||
| verse_lines = प्रथमावल्ली | |||
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